Tuesday, February 28, 2012

मै एक सामान्य प्राणी

मैं एक सामान्य प्राणी हूँ
विश्व के सबसे दुर्दांत प्रजाति हैं जो
उसका एक अभिन्न हिस्सा हूँ
ये वो हैं जिनके हौसले न पस्त होते
दिन -रात जिसके डर से अपना समय बटोरते
मैंने अपने पथ को खुद ही प्रसस्त किये
जो नहीं पथ मिले तो क्या हुआ ?
मैंने नए पथ खुद ही जोड़ लिए
मेरी उपस्थिति को क्या बताऊँ तुमसे 
नभ , थल और ये पातळ ; साछी हैं 
सुननी मेरी कहानी हो तो ;देख लो इतिहास
हैं उम्मीद जुडी यहाँ  हर एक हिस्से से
हर हिस्से से जुड़ा ये निर्माण हैं
जो हर पल दर पल रचने में लगा इतिहास हैं
तो ऐसा क्या होता जो टूट जाते टुकडो में तुम
वो हिस्सा वो जूनून का हैं तुसे भी उतना ही वास्ता
अनुभव करो पुनः उस प्रचंड उष्मा का
जो व्याप्त यहाँ प्रधान हैं ; और जो पर्याय हैं
क्या अमेरिका और क्या भारत ;क्या मैं और क्या तुम ?
मानव धर्म हैं यहाँ प्रधान हैं !!
ये कागज और ये कलम साछी हैं इस पल के
जो बार -बार प्रेरित करते मुझको की रुकने का क्या सार हैं 
अगर  व्याप्त हैं ये आकाश ; तो हो व्याप्त तुम भी
अंतर्मन के राज्य के हो तुम स्वामी
मुमकिन हैं हर वो सफलता तुमसे
क्योंकि अंत मैं तुम ठहरे इस दुर्दांत प्रजाति का हिस्सा ही !!
                                                                         अभिषेक तिवारी  "अज्ञात"

 

Sunday, February 26, 2012

विरानिया

सदीओ से वीरान खड़ा हूँ ऐसा लग रहा हैं
खुद मैं ही इतना डूबा हुआ हूँ क्यों  ऐसा लग रहा हैं
मैं तो  बना हुआ हूँ ;तेरे  लिए ऐ मालिक फिर
ये मेरा खुद में ही रहना ; इसका मुझसे क्या वास्ता 
खुला सागर सा  रखो मेरा ह्रदय  मौला  यही  प्रार्थना हैं
कई दिलो के जख्मो  को समेटना हैं
खुद मैं नही खोना हमको कभी
कुछ खुद से उम्मीदे हैं और कुछ अपने पीछे के लोगो से
पता हैं ? इस समय मैं याद  थोड़ी न आने के लायक हूँ
पर मैं बताऊँ  आपको  मैं ऐसा नही हूँ
बहुत  प्यार  हैं आप  लोगो के लिए इस दिल  मैं
इस बात को मैं कैसे बयां कर   पाऊँ   उलझन  हैं मेरी
मैं जानता    हूँ की  शायद  ये बात  आप समझते    होंगे  
की आप लोग  ही मेरी जिन्दगी  के मायने  हूँ 
आप लोग  के दिए  हुए  शिछा   का  कर्जदार  हूँ मैं
मौला देना  पथ  मुझको  ऐसा मुझको  जो  मंजिल  तक  जाता  हो 
और भूल  के भी  किसी  का  अहित  ना  हो
सहन  शक्ति   बढाओ  इतना की हर  गम  लगे  छोटा 
खुद के शक्ति  से इन  संसय रूपी चट्टान  का  कर संकू सामना          

सुबह

सुबह के ठंडी हवा के झोके!
कोयल के कूकने का आभास  हर पल!!
घुली हवाओ मैं एक खुशबू!
लेने  को बेताब अपने आगोश में!!
सूरज का तडके आयाम को छोड़ना!
हर जगह  एक प्यारा उल्लास होना !!
भर जाती तन मन  मैं ताजगी एकदम!
इस सुबह का निराला ही प्रभाव होता !!
सत्य  भी यही हैं अटल और अविचल !
रात के बाद सुबह होती और सुबह के बाद पुनः रात्रि!!
मानव जीवन से हैं रिश्ता इसका पुराना !
यहाँ भी सुख और दुःख एक दुसरे के पहलु हैं!!
वैसे ठीक एकदम जैसे सुबह जुडी रात्रि से !
प्रकृति जैसे सबकुछ समझा देती बरबस!!
यही तो इस गुरु का अनुपम प्रभाव हैं!
हम मनवो की बुद्धि ही थोड़ी  जड़ हैं!!
जो सरे संसाधनों के होते जाते कहीं और हैं!
जैसे तैसे फिर लौट के आते वही हैं!! 
मैं हूँ इसका एक प्रबल उदाहरन!
पर इस पल से हूँ प्रबल   !!
हैं क्या जो मानव नहीं कर सकता!
तेरे बल से तो गजराज का सिहांसन हिलता !!
बस एक बार जज्बा तो दिखा ऐ नौजवान !
मंजिल तो होगी ही तेरी ;ये कारवां भी होगा  तेरा ही !!
                                                                अभिषेक तिवारी  "अज्ञात"     
 
   
   

Tuesday, February 21, 2012

मेरा बचपन

जब बचपन था तो सपने पलते थे
ऊँचा सा नभ था तो उतने ऊँचे जज्बे थे
खेतो में बाबा का वो काम कराना
पसीने से तरबतर लगातार पम्प चलाकर हो जाना
गायों को चारा खिलाना और क्या क्या खूब देखना उनका दूध
हा.. हा खुद पे गर्व सा हो जाये जब दूध से बाल्टी भर जाये
खिलाना इतना चारा प्यारी को की उसका पेट फूल जाये
और बैठ घंटो टकटकी लगाना
समय जब पाऊं तो क्रिकेट जमाऊं
मैच के मैच क्या सेंचुरी लगाऊं
हम भाइयो के बिच कितना प्रेम बहता था
रोज सुबह वो तडके उठ जाऊं
और वो नीम के दातून से दांत माजना
और ये प्यारी सी ताजगी का होना
फिर बरी आती स्कूल जाने की
तो आती बरी चलाने की रामप्यारी को
हम तीन सिकंदर होके सवार जाते विद्यालय को
एक साथ क्या जज्बा था वो भाई होने का 
रास्ता से होकर गुजरते आमों   के पेड़ो  पे वो पत्थर चलाना
और घर लौटते वक्त  ढेर सारा आम तोड़ लाना
मम्मी  का वो खट-मिट्ठा  बनाना
गर्मियों की छुट्टियो में पोखरे पे गाए को चराना
क्या खूब पल थे वो की दिखती अप्सरा सी मेरी  सिटी
मुख घुमा घुमा के हरे घासों को चरति वो
इन पलों का क्या सुन्दर रिश्ता था मुझसे
की इस पल में यही सोचता हूँ !!
हूँ वीर प्रतिछन में यहाँ से अब यही सोचता हूँ
कुछ  फर्ज  मेरा  हैं तुम्हारे हेतु अगर ये जुडाव हैं तुझसे
खुद पे रहे विस्वास तो होगा ये संभव ;निर्भीक हूँ अबसे  ये मानता हूँ
                                                                            अभिषेक तिवारी "अज्ञात"
  

 
  
 

हौसला

हौसला  चाहिए  इतना   बुलंद 
की  हो  जाये  हर  सफ़र  मुमकिन 
ये  वक्त  का  तकाजा  हैं  आज  का
मन  की   शक्ति  से  साकार  कर  सपना 
तू  न  झुका  हैं  कभी  न  झुकेगा  कभी
तू  खुद  को  कर  इतना  बुलंद  
तू  ही   खुद  का  देवता  ; जो  चाहता  हैं  तू 
साधन  हैं   तू  ले  ले   वो  तू  खुद  से
अपना  मलंद   खुदी  को   कर  इतना   बुलंद
क्या  हैं  जो  नहीं  संभव  तुझसे 
एक  बार  झक  तो  सही  अंदर  
एक   खदान     भरा   पड़ा  हैं  यहाँ   पे 
तुझे  खोज   रहा  प्रतिछन
स्वाति     के  बहती  प्रतिच्छा  में तेरे 
हैं   व्याकुल   हर  पल   दर  पल 
झक  खुद  के  अंदर  हर   छन  होगा  तेरे  तबसे 
और  तू  खुद  ही  बन  जायेगा  अपना  विधाता !!!
                                                    अभिषेक तिवारी "अग्यात"



 ऐ घडी तुझसे एक बात पुछु ?
तू हर पल कैसे सजग रहता  हैं!!
हमें हर वक्त का एहसास करता !
तू निर्भय सा हैं !!
समय की चल समझाता हैं
जो न रुकता कभी न थकता कभी
और तो और न किसी का होता हैं
एक पल रजा कोई और दुसरे पल रंक होता हैं
ऐ घडी ..........................................२
हमारी भी चाभिया  हैं भरी हुई हैं 
और  पल दर पल ये खत्म होता जा रहा 
पर  ना ख़त्म  होते हमारे दुर्गुण
 ये क्या कठिन पहेली हैं की
जब हल निकले तो जाने का समय हो जाता  
ऐ घडी ..................................................!!!!!
                                                        अभिषेक तिवारी "अज्ञात"


Sunday, February 19, 2012

बेबसी

कैसी हैं ये बेबसी सी दिल मैं हर पल
चंहु तेरी ख़ुशी हर पल ;पर क्या हैं जो बयां न कर पाऊं
घुट जाता हूँ  इस पल में  हमेशा  की  क्या हूँ में
तू खुश रहे हर पल दिल की दुआ  हैं हमेशा
और क्या कहूँ में खुद से जो तुझको दे बता    
इतनी  भी आत्मकेन्द्रीयता सही नहीं ;पर न जानु  क्यों हैं ये 
दुनिया भागी  जा रही समय की गति से पर मैं हूँ की किनारे पर खड़ा
अंतर्मन  मैं व्याप्त घोर  निराशा   ;पर इस पर भी हैं खुद से आशा
ये साँस छुटेगी  मंजिल   को पाकर   ही भले मरू  भूमि 
 मैं खो जाना पड़े 
मैं क्या हूँ एक तिनका  और उसमें भी छोटा सा प्रकार
मजाक हूँ लोगो का   इस पल और खुद का भी
पर हैं एक प्रज्वलित अग्नि  अन्तेर मैं छुपी जो
हर पल याद  दिलाती तेरी शिच्छा   भी उजली
तू था हर पल उजला  तो इन कालिख से ना घबरा
ये तो वक्त का तकाजा हैं तुझे झकझोरने का
 पता हैं मानव क्या था प्रारंभ मैं और अब  क्या हैं ??
हम अब्बध गति से प्रयोजन साधते और आगे बढ़ते 
इन प्रयोजनों को ही खुद का अनुनाद  बना खुद का
खुद को प्रजवलित कर जिन्दगी तो दुसरो के लिए  ही जिया  करतें  हैं
इस पर मेरा  हो गया  कबसे  अधिकार  ; मैं तो सेवक हूँ
उसके हर आदेश का तो इस कष्ट का क्या हैं सार
पथ सुदृढ़  हो जाते जब खुद पे हो विश्वास
पथ सुदृढ़  कर और बढ़ आगे तू निर्बाध गति से
खुद को बना निर्भय वैसे तो तेरा नाम ही निर्भय हैं
इन बातो का अब से हैं नही मुझसे  कोई वास्ता मैं तो हूँ
खुद मैं डूबा एक मोती जो हीरे के पथ पर बढ़ चला हैं उन्मुक्तता सें!!!
                                                                              अभिषेक तिवारी "अज्ञात"              

Wednesday, February 8, 2012

LIFE













क्या  हैं ये जिन्दगी के रंग..!
एक पल भरे भरे से ये एक पल  कम !
खो  जाते हैं हम भी अपने  साए  में उस पल!
जिस पल मालूम पड़ता की यही  हैं वो रंग !!
सुने रास्ते हर पल ; हाशिये पे रहते यहाँ रिश्ते !
फिर भी जीवन  का मंजर करवट बदलता रहता !!
और बार बार अपने आप से प्रश्न पूछने को कहता !
क्या बिगड़ी सी मेरी मौलिकता सुधरेगी एक बार और ?
क्या वो पथ जो अनसुलझे  से लगते ; सुधरेंगे एक बार और ?
इन्ही  रंगों को समेटता चलता और जिन्दगी से नए वादे किये चलता !
इन्ही रंगों से सरोबर  हैं जिन्दगी और फिर  क्या कहें ??
जीने  का नाम हैं जिन्दगी !!!!!!!! 
                                               अभिषेक तिवारी