मैं एक सामान्य प्राणी हूँ
विश्व के सबसे दुर्दांत प्रजाति हैं जो
उसका एक अभिन्न हिस्सा हूँ
ये वो हैं जिनके हौसले न पस्त होते
दिन -रात जिसके डर से अपना समय बटोरते
मैंने अपने पथ को खुद ही प्रसस्त किये
जो नहीं पथ मिले तो क्या हुआ ?
मैंने नए पथ खुद ही जोड़ लिए
मेरी उपस्थिति को क्या बताऊँ तुमसे
नभ , थल और ये पातळ ; साछी हैं
सुननी मेरी कहानी हो तो ;देख लो इतिहास
हैं उम्मीद जुडी यहाँ हर एक हिस्से से
हर हिस्से से जुड़ा ये निर्माण हैं
जो हर पल दर पल रचने में लगा इतिहास हैं
तो ऐसा क्या होता जो टूट जाते टुकडो में तुम
वो हिस्सा वो जूनून का हैं तुसे भी उतना ही वास्ता
अनुभव करो पुनः उस प्रचंड उष्मा का
जो व्याप्त यहाँ प्रधान हैं ; और जो पर्याय हैं
क्या अमेरिका और क्या भारत ;क्या मैं और क्या तुम ?
मानव धर्म हैं यहाँ प्रधान हैं !!
ये कागज और ये कलम साछी हैं इस पल के
जो बार -बार प्रेरित करते मुझको की रुकने का क्या सार हैं
अगर व्याप्त हैं ये आकाश ; तो हो व्याप्त तुम भी
अंतर्मन के राज्य के हो तुम स्वामी
मुमकिन हैं हर वो सफलता तुमसे
क्योंकि अंत मैं तुम ठहरे इस दुर्दांत प्रजाति का हिस्सा ही !!
अभिषेक तिवारी "अज्ञात"
विश्व के सबसे दुर्दांत प्रजाति हैं जो
उसका एक अभिन्न हिस्सा हूँ
ये वो हैं जिनके हौसले न पस्त होते
दिन -रात जिसके डर से अपना समय बटोरते
मैंने अपने पथ को खुद ही प्रसस्त किये
जो नहीं पथ मिले तो क्या हुआ ?
मैंने नए पथ खुद ही जोड़ लिए
मेरी उपस्थिति को क्या बताऊँ तुमसे
नभ , थल और ये पातळ ; साछी हैं
सुननी मेरी कहानी हो तो ;देख लो इतिहास
हैं उम्मीद जुडी यहाँ हर एक हिस्से से
हर हिस्से से जुड़ा ये निर्माण हैं
जो हर पल दर पल रचने में लगा इतिहास हैं
तो ऐसा क्या होता जो टूट जाते टुकडो में तुम
वो हिस्सा वो जूनून का हैं तुसे भी उतना ही वास्ता
अनुभव करो पुनः उस प्रचंड उष्मा का
जो व्याप्त यहाँ प्रधान हैं ; और जो पर्याय हैं
क्या अमेरिका और क्या भारत ;क्या मैं और क्या तुम ?
मानव धर्म हैं यहाँ प्रधान हैं !!
ये कागज और ये कलम साछी हैं इस पल के
जो बार -बार प्रेरित करते मुझको की रुकने का क्या सार हैं
अगर व्याप्त हैं ये आकाश ; तो हो व्याप्त तुम भी
अंतर्मन के राज्य के हो तुम स्वामी
मुमकिन हैं हर वो सफलता तुमसे
क्योंकि अंत मैं तुम ठहरे इस दुर्दांत प्रजाति का हिस्सा ही !!
अभिषेक तिवारी "अज्ञात"
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