Sunday, February 19, 2012

बेबसी

कैसी हैं ये बेबसी सी दिल मैं हर पल
चंहु तेरी ख़ुशी हर पल ;पर क्या हैं जो बयां न कर पाऊं
घुट जाता हूँ  इस पल में  हमेशा  की  क्या हूँ में
तू खुश रहे हर पल दिल की दुआ  हैं हमेशा
और क्या कहूँ में खुद से जो तुझको दे बता    
इतनी  भी आत्मकेन्द्रीयता सही नहीं ;पर न जानु  क्यों हैं ये 
दुनिया भागी  जा रही समय की गति से पर मैं हूँ की किनारे पर खड़ा
अंतर्मन  मैं व्याप्त घोर  निराशा   ;पर इस पर भी हैं खुद से आशा
ये साँस छुटेगी  मंजिल   को पाकर   ही भले मरू  भूमि 
 मैं खो जाना पड़े 
मैं क्या हूँ एक तिनका  और उसमें भी छोटा सा प्रकार
मजाक हूँ लोगो का   इस पल और खुद का भी
पर हैं एक प्रज्वलित अग्नि  अन्तेर मैं छुपी जो
हर पल याद  दिलाती तेरी शिच्छा   भी उजली
तू था हर पल उजला  तो इन कालिख से ना घबरा
ये तो वक्त का तकाजा हैं तुझे झकझोरने का
 पता हैं मानव क्या था प्रारंभ मैं और अब  क्या हैं ??
हम अब्बध गति से प्रयोजन साधते और आगे बढ़ते 
इन प्रयोजनों को ही खुद का अनुनाद  बना खुद का
खुद को प्रजवलित कर जिन्दगी तो दुसरो के लिए  ही जिया  करतें  हैं
इस पर मेरा  हो गया  कबसे  अधिकार  ; मैं तो सेवक हूँ
उसके हर आदेश का तो इस कष्ट का क्या हैं सार
पथ सुदृढ़  हो जाते जब खुद पे हो विश्वास
पथ सुदृढ़  कर और बढ़ आगे तू निर्बाध गति से
खुद को बना निर्भय वैसे तो तेरा नाम ही निर्भय हैं
इन बातो का अब से हैं नही मुझसे  कोई वास्ता मैं तो हूँ
खुद मैं डूबा एक मोती जो हीरे के पथ पर बढ़ चला हैं उन्मुक्तता सें!!!
                                                                              अभिषेक तिवारी "अज्ञात"              

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