जब बचपन था तो सपने पलते थे
ऊँचा सा नभ था तो उतने ऊँचे जज्बे थे
खेतो में बाबा का वो काम कराना
पसीने से तरबतर लगातार पम्प चलाकर हो जाना
गायों को चारा खिलाना और क्या क्या खूब देखना उनका दूध
हा.. हा खुद पे गर्व सा हो जाये जब दूध से बाल्टी भर जाये
खिलाना इतना चारा प्यारी को की उसका पेट फूल जाये
और बैठ घंटो टकटकी लगाना
समय जब पाऊं तो क्रिकेट जमाऊं
मैच के मैच क्या सेंचुरी लगाऊं
हम भाइयो के बिच कितना प्रेम बहता था
रोज सुबह वो तडके उठ जाऊं
और वो नीम के दातून से दांत माजना
और ये प्यारी सी ताजगी का होना
फिर बरी आती स्कूल जाने की
तो आती बरी चलाने की रामप्यारी को
हम तीन सिकंदर होके सवार जाते विद्यालय को
एक साथ क्या जज्बा था वो भाई होने का
रास्ता से होकर गुजरते आमों के पेड़ो पे वो पत्थर चलाना
और घर लौटते वक्त ढेर सारा आम तोड़ लाना
मम्मी का वो खट-मिट्ठा बनाना
गर्मियों की छुट्टियो में पोखरे पे गाए को चराना
क्या खूब पल थे वो की दिखती अप्सरा सी मेरी सिटी
मुख घुमा घुमा के हरे घासों को चरति वो
इन पलों का क्या सुन्दर रिश्ता था मुझसे
की इस पल में यही सोचता हूँ !!
हूँ वीर प्रतिछन में यहाँ से अब यही सोचता हूँ
कुछ फर्ज मेरा हैं तुम्हारे हेतु अगर ये जुडाव हैं तुझसे
खुद पे रहे विस्वास तो होगा ये संभव ;निर्भीक हूँ अबसे ये मानता हूँ
अभिषेक तिवारी "अज्ञात"
ऊँचा सा नभ था तो उतने ऊँचे जज्बे थे
खेतो में बाबा का वो काम कराना
पसीने से तरबतर लगातार पम्प चलाकर हो जाना
गायों को चारा खिलाना और क्या क्या खूब देखना उनका दूध
हा.. हा खुद पे गर्व सा हो जाये जब दूध से बाल्टी भर जाये
खिलाना इतना चारा प्यारी को की उसका पेट फूल जाये
और बैठ घंटो टकटकी लगाना
समय जब पाऊं तो क्रिकेट जमाऊं
मैच के मैच क्या सेंचुरी लगाऊं
हम भाइयो के बिच कितना प्रेम बहता था
रोज सुबह वो तडके उठ जाऊं
और वो नीम के दातून से दांत माजना
और ये प्यारी सी ताजगी का होना
फिर बरी आती स्कूल जाने की
तो आती बरी चलाने की रामप्यारी को
हम तीन सिकंदर होके सवार जाते विद्यालय को
एक साथ क्या जज्बा था वो भाई होने का
रास्ता से होकर गुजरते आमों के पेड़ो पे वो पत्थर चलाना
और घर लौटते वक्त ढेर सारा आम तोड़ लाना
मम्मी का वो खट-मिट्ठा बनाना
गर्मियों की छुट्टियो में पोखरे पे गाए को चराना
क्या खूब पल थे वो की दिखती अप्सरा सी मेरी सिटी
मुख घुमा घुमा के हरे घासों को चरति वो
इन पलों का क्या सुन्दर रिश्ता था मुझसे
की इस पल में यही सोचता हूँ !!
हूँ वीर प्रतिछन में यहाँ से अब यही सोचता हूँ
कुछ फर्ज मेरा हैं तुम्हारे हेतु अगर ये जुडाव हैं तुझसे
खुद पे रहे विस्वास तो होगा ये संभव ;निर्भीक हूँ अबसे ये मानता हूँ
अभिषेक तिवारी "अज्ञात"
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