Friday, April 6, 2012

मन तो चालक है

ना झुकना कभी खुद मैं
दर्द इससे बड़ा न होता कोई
खुद पे विस्वास हो हर पल  तो हित साधता कोई
चट्टान भी रहता खड़ा धुप को सहेजे खुद में हर पल
पर आखिर ठहरा वक्त का गुलाम ;जो घिस जाता
तो क्या हुआ घिसाव निर्माण से ही तो हैं सुनिश्चित
क्या हो सका बदलाव इसमें; हो भरपूर प्रयाश हर पल
वक्त को सम्मानित कर ; क्योंकि वक्त ही सोना हैं
हर पथ जाता खुदी से होकर ; मन तो चालक हैं
तो सही हैं क्या और गलत क्या सोच यह और आगे बढ़ !!!!    

श्रृजन का प्रयास

झकझोर के रख दो इस बार
प्रयास मैं हो तुम्हारे इतना धार
हर पल का प्रहार समेटना तुमको
हो रहा प्रबल विस्वास खुद पर
फर्ज की गठरी रास्तें पर पड़ी हैं
पर पहले बदलाव जरुरी हैं
खुद मैं एक धनात्मक बदलाव की श्रंखला
चला दो बवंडर ऐसा हर पल भरपूर
सम्पूर्णता तो नही आती पर प्रयास हो प्रचुर
तुम ही रचियता खुद के ;दूसरा न कोई साथी
हर कदम पर हैं जिम्मेदारी खुद की तोहफा हैं असल यही
चाहें जोड़ लो या तोड़ लो , यही से होगा मार्ग प्रसस्त
खुद का गुरु स्वमेव तुम्ही ; विकटता से क्या भय
जो नही जगे अब भी तो क्या मतलूब हैं
उठ जाओ मानुष की हर पल हो तुम प्रबल
लागों कार्यो के पूर्णता की झड़ी अबसे
आलिंगन करे लछ्य तुमसे इस बार ऐसे
जैसे स्वाति को एक बूंद का हो इंतजार
तुम ही विधाता ; स्वामी भी तुम ही खुद के
तो चलो आज फिर से पूर्ण होकर
चलो लछ्य पथ पर नया सृजन हेतु लेकर !!!   


   

जिन्दगी तेरा खुबसुरत खेल

मैं हूँ तुम हो और ये जिन्दगी
क्या खूबसूरत खेल जो हैं ये खेलती
पल दर पल एक नए अनुभव विचारो से ये कराती
जो न रुकतीं कभी न थकते कभी प्रस्फुटित अविचल
जिनकी उर्जा ना होती खत्म कभी रहें हर दम चंचल
क्या बात हैं मानव रचना की विचारो से आलिंगन की
इस अभियांत्रिकी को तुम क्या कहोगे जो हैं गुध्तुम प्रधान
कोई तो युक्ति होगी जो इस रचना से करेगी रूबरू
और कहेगी हमसे ये मार्ग चुनो जो लछ्य तक जाता हैं
जो बताता ये मार्ग हैं चलने का ; और चल चलें हम
मेरा मार्ग तो सफ़ेद रंग सा हैं होता प्रतीत मुझको
चल चलें हैं निरंतरता से पर दीखते नही पग
क्या होती ऐसी ही जिन्दगी ; दूरदर्शन का क्या इंतजाम
कुछ बदलाव तो नितांत प्रधान इस पल से
जो शायद दे मेरा मार्ग हरा सा ; प्रयास सुरछित
कल प्रधानतम दृश्य प्रदर्शित होगा आखों को
इस लिए चलते रहना नितांत हैं यहाँ आवश्यक !!
            

लोग कैसे सफल होते

एक बार सोच  लोग सफल कैसे होते हैं
एक ही उदेश्य को  वो रोज  हजार बार जीते हैं
मैं भी क्या पागल हूँ , एक कदम चला; सपना पलता हूँ
पर कहूं और क्या ;सफलता की गली भी तो यही
ये वो प्राणी होते जिन्हें हर पल आभास रहता
चेतन मैं चेतना बहती हर पल और खुद पे विस्वास होता
मैंने सोचा क्योँ न सोंचू पिताजी के बारे में
क्या उन्होंने नहीं देखा होगा सफलता का सपना
जो आज उनके कठिन परिश्रम के बाद फलता
रोज रात के रात वो गाड़ी पे क्यों दौड़ा करते
इसी प्रक्रिया मैं खाने पिने की सुध भुला देते
ये था सपने का छोटा सा प्रकार ; जो हैं एक गुढतम रहस्य
हम चलते रास्तो पे खोज सकते कुछ भी मुमकिन
तो क्या नहीं मुमकिन की खुद को करूँ एकाकार
हो विस्वास प्रगाढ़ खुद पे और और चेतना हो प्रस्फुटित
हर पल आखों मैं अग्नि ;ऊपर एक योजना पालें
जो इन अनगिनत मोड़ रूपी रास्तें को सीधा कर दे
योजना से याद आया की योजन यही से साधतें
कभी मैंने भी योजना बने होती थी अभी छोड़ दिया था
यही वो वजहें थे जिनसे मार्ग दुर्गम हुआ था
यहाँ हर समय योजना से बीतना चाहिए पल पल
योजना बनाओ खुद को हसमुख बनाने की
विचारो को एकाकार कर करों स्वप्न साकार
योजना बनाओं खुद को मजबूत बनाने की
योजना बनाऊं खुद को एकाग्र होने की
योजना बनाऊं लक्ष्य पाने की
समय प्रधान सारे योजन बन्दे झांक खुद मैं
और समय पाबंद बन तू ;हर पल हो सचेत
सामजिकता भी मेरा एक बड़ा प्रयोजन हैं
पर इसके मध्य कई योजन हैं
 एक बार सोच लोग सफल कैसे........२
                                          अभिषेक  तिवारी  "अज्ञात "        
       

मनुष्य मै विराट खजाना

मनुष्य हूँ मैं ; एक विराट खजाना
खोज पाऊं खुद को यही हैं सपना
हर पल व्याप्त चुनौतिया रास्तो पे पग पग
याद करा देती ये  अस्तित्व के पर्याय को
खुद को बांध देती  मजबूरियां यहाँ पे
 समझता मन में की समझेगा विपछि
पर हर बार मिलता एक बड़ा सा दुत्कार मिलता यहाँ पे
जानता हूँ की हैं एक प्रचंड अग्नि भीतर
पर क्या खोज हैं मेरे अन्तेर की
स्वावलंबन और आत्मसम्मान दो ध्रुव मेरे
मेरे रस्ते यही से होकर हैं गुजरते
पर क्योँ दिग जाता हूँ पथ से खाके ठोकर
क्या सिखा नही जीना जीवन ; ठोकरे ही तो पर्याय हैं
ये मानता हूँ की हर गुण हैं सीखना मुमकिन
खाजन तो तो होता ही हैं एक से प्रकार
तो क्या बंधे हैं तुझे बढ़ने से मानुष
इस व्याप्त अनुनाद का तू भी तो हैं एक प्रकार
तू कर्मो से जुटता हुआ तो हैं पर फल की चिंता करता हैं
ये ही मिथ्या विचार पलता हैं ;याद कर गीता का सार
कर्मो को तू पुर्नाभाव से कर पर पाल न फलों की
 सूर्य के ओज का कर ध्यान क्या उसने फल मांगे  हैं
क्या चन्द्रमा  ने  फल   की इच्छा  की हैं ; तू कर्म कर
और स्वचंद्ता से आगे बढ़ ; क्योकि सोना ऐसे नही बनता
अभी तो दो कदम चला हूँ ; सैकड़ो मिल सफ़र बाकी हैं
सांसे तो चली अभी थोड़ी ; रौद्र रूप बाकि हैं
खुद पे हर चन भरोसा रख बन्दे
समय की कीमत समझ सदा तू
इस समय ने बड़े राजाओं को भी देखा हैं तो रंको भी
आज अगर तू इसमें आज अचाई का हवन देगा
तो नीचे ही कल कल पुण्य ही फूलेगा
खुद पे विस्वास हैं हर पल
और  मनुष्य मैं मनुष्यता के खजाने को खोजे आगे बढ़ चल !!