क्या हैं ये जिन्दगी के रंग..!
एक पल भरे भरे से ये एक पल कम !
खो जाते हैं हम भी अपने साए में उस पल!
जिस पल मालूम पड़ता की यही हैं वो रंग !!
सुने रास्ते हर पल ; हाशिये पे रहते यहाँ रिश्ते !
फिर भी जीवन का मंजर करवट बदलता रहता !!
और बार बार अपने आप से प्रश्न पूछने को कहता !
क्या बिगड़ी सी मेरी मौलिकता सुधरेगी एक बार और ?
क्या वो पथ जो अनसुलझे से लगते ; सुधरेंगे एक बार और ?
इन्ही रंगों को समेटता चलता और जिन्दगी से नए वादे किये चलता !
इन्ही रंगों से सरोबर हैं जिन्दगी और फिर क्या कहें ??
जीने का नाम हैं जिन्दगी !!!!!!!!
अभिषेक तिवारी

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