हम तो आग पे हाथ रख के चल पड़ें हैं
जलें या जला दे ; क्या कर सकते हैं
रास्तों पे निशान लगाके छोड़े ;कुछ बढ़ चलें हैं
हम तो आग ...................................
चाहें भी तो बचना तो क्या मुमकिन हैं
ऐसा ही कुछ तमाशा हम बन चलें हैं
गोयाकि सुना हैं हर बार कुछ अच्छा
फिर भी आग पे चलने का सबा बन पड़ें हैं
होगी राहों पे रत और सवेरा भी ये सोच चलें हैं
हम .............................
खुद को पाना हैं हर हल मैं ये वादा कर चलें हैं
तनहइयो के पार ही जन्नत हैं ऐसा मान चले हैं
हम तो ...............
जलें या जला दे ; क्या कर सकते हैं
रास्तों पे निशान लगाके छोड़े ;कुछ बढ़ चलें हैं
हम तो आग ...................................
चाहें भी तो बचना तो क्या मुमकिन हैं
ऐसा ही कुछ तमाशा हम बन चलें हैं
गोयाकि सुना हैं हर बार कुछ अच्छा
फिर भी आग पे चलने का सबा बन पड़ें हैं
होगी राहों पे रत और सवेरा भी ये सोच चलें हैं
हम .............................
खुद को पाना हैं हर हल मैं ये वादा कर चलें हैं
तनहइयो के पार ही जन्नत हैं ऐसा मान चले हैं
हम तो ...............
बहुत सुन्दर, बधाई.
ReplyDeleteकृपया मेरे ब्लॉग "meri kavitayen"पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा.
Dhanyawad guru ji; aapke margdarshan ka aakanchi rahunga!!
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