Sunday, December 25, 2011

Silence


 वास्तविकता से दूर वीरान से जंगल में यूँही जाने को जी चाहता हैं!
ख़ामोशी मैं चुपचाप डूबजाने को जी चाहता हैं!!
क्या हैं इस ज़माने की मौलिकता जो हर छन भेद  बदलती !
हर बार इस मासूम से अंतर्मन  को नए प्रश्न देती!!
इन प्रश्नों से  ही भाग जाने को जी चाहता हैं !
अपने आप के साए को भी नहीं चाहता देखना !
इस कदर भागने को जी चाहता हैं !!
वास्तविकता से दूर ..................................जी चाहता हैं !!
हर बार जाना तो चाहता हूँ मंजिल के पीछे !
पर क्या बात हैं जो रोकना रास्ता चाहता हैं ??
वास्तविकता से दूर .............. जी चाहता हैं !!
कहते हैं डूब जाओ खुद में पाने को  मोती !
वही मोती जो किस्मत को हैं जोडती   !!
पर क्या हैं वो बात जो पथ रोकना चाहता हैं !
वास्तविकता से दूर .............. जी चाहता हैं !!
                                                       अभिषेक तिवारी
 

Friday, December 23, 2011

प्रयास


जिन्दगी को समझना चाहा बहुत मैंने !
नाकाबिल रहा अब तक फासले पाटने में !!
दस्तक तो लगातार मिलती गयी मुझको !
शिकवा रहा यही की , लगा रहा अपने मैं !!
तो क्या गलतिया हुई हैं हमसे कहीं ??
खुदगर्ज शरीफ़ हूँ मैं , इसका जरा सा भी नहीं इल्तजा !!
ठीक हैं - समझ रहा हूँ , अपनी बेबसी को !
पर करूँ क्या!! और ये क्या हैं ये माजरा ??
उम्मीद का दामन तो नहीं टुटा हैं , अभी तक!
बस फर्क इतना हैं की लौ धीमी हो गयी हैं !!
खुद को हमेशा उडेधता रहा मैंने क्या ?
जिन्दगी इसलिए इतनी उदासीन हो गयी हैं !!
ऐ मालिक के नेक बन्दे , ऐसे न उदास हो !
फिर से अपनी लौ की तलाश कर !!
झाक के देख किसी कोने में ; एक चिंगारी खोज में तेरे !
सुखी जा रही हैं ..................................................!!
उम्मीद के दामन का हमेशा साथ दे , गोया की !
जिन्दगी बड़ी लम्बी हैं पर किस तरह काटे !!
हैं ; ये तुझपे निर्भर , उठ एक बार फिर से !
वंदना कर , नमन कर के एक हुंकार भर !!
सांसो में एक फुंकार भर ; हो जायेगा !
सब संभव कही से कुछ भी नहीं रहेगा !
असंभव , मालिक की भी यही रजा हैं !!
की खुद को तू न कम समझ ;कोशिशे !
हमेशा होती हैं सफल , कर इसे बुलंद !!
और ले ले अपना मलंद !!!!!
अभिषेक तिवारी

अंतर्द्वंद


क्या हैं सिमटी सी मौलिकता मेरी !  
हर एक पत्थर के चोट पर , असहाय सी !!
 प्रतिस्वर ,और अनुभूति , से विमुख!  
किस गल्प मैं खोया हैं; ये पूछता अंतर्मन !!  
क्या करू किसके पास जाऊ , कोई नही क्या इस जग मैं मेरा ?? पापो के पिटरो से बड़ा पिटारा रखा हैं , ये ! 
वेदना की अनुपम सीमओं से आलिंगन करता बारंबार !! अपने आप से सवालो को तलाशता एक भिखारी !  
जिसने सिख लिया हैं जमानो के टुकडो पर पलना !!  
होगा तो कोई दरवाजा जो खोलेगा रह मेरी !  
देगा छुटकारा इस अंधी दौड़ से!! 
                                          अभिषेक तिवारी

मंजील की तलाश













उन्मुक्तता के धरातल पे पसरा येआसमान !
जो चाहे , बस में, खुली छुट है इसको !!
खोल देता पिटारा बरबस ,कर देता धरा को तृप्त !
जो धधकती रहती हैं ,सूरज की कीर्ति से !!
क्या सुन्दर सामंजस्य हैं इस प्रक्रिया का !
जो होता रहता , बारम्बार ; लगातार !!
संतुलन और समझौता दो ध्रुव हैं जीवन के !
क्या खूब समझाता , यह धरा और नभ के मिलन से !!
संभव भी हैं ये छुट जाये , पर सामंजस्य नही टूटता !
क्योकि यही सामंजस्य इन्हें जोड़े रखता !!
प्रक्रिया चलती रहती लगातार ; बारम्बार !
जो निरंतर हमें समझती की , रुकने का नही हैं कोई सार!!

अभिषेक तिवारी

अस्तित्व



अपने अस्तित्व को बचाने के जुगत में जुटा!
खुद को एक बार पाने को जगा !! 
उम्मीद हैं ,इस बार बारिश होगी इस जमीं पे ! 
तो मेरा एक अनलिखा दास्ताँ होगा!! 
आरजू को बढ़ा रहा हूँ जलने को ! 
एक बार फिर हौसला कर आयेने में सजने को !! 
अपने अस्तित्व ..................... 
उम्मीद के सितारों के साथ , की हैं गुफ्तगू इस बार!
 देखना बस बाकि हैं ; हौसलों में हैं कितना गुबार !! 
चट्टान तो होते ही हैं, टूटने को ! 
पैमाने तो होते ही हैं ; छलकने को !! 
उम्मीद हैं की वक्त के पहिये को मोड़ लूँगा ! 
अपने अस्तित्व को खोजता , एक तारा समेत लूँगा!! 
वैसे भी उम्मीद पे तो ये दुनिया टिकी हैं , मालिक ! 
हौसलों और जज्बो पर ही तो आज तक पली हैं!! 
उम्मीद हैं इस बार बारिश होगी जमीं पे !!!!!!! 
                                               अभिषे तिवारी

THE MECHANICALS








 





There is way,but use of way just because of Mechanical s!
World rock today,its just because of Mechanical s!!
In sky and in earth deeper side, the eternity which surrounded!
It`s not other one else ,its just mechanical s !!
We create idea`s to enhance mobility & boost it by our invention!
who responsible for that??? just one an only Mechanical s!!
How wast we are from oil to water & air to vaccum, the sence of presence is just every where Who WE ARE
!!!!!! THE MECHANICAL S!!!!!!!

Friday, December 9, 2011

START........................ a NeW JoURnY

Its my first day in blogging Zone  ; I share here True desire to create change and make new space in life  !!!      friends as every youth dream in his life to achieve some golden sparrow but this a continuous process and thousand of thoughts which integrate together to make u able to achieve your dream!!!!!I am here for sharing new project ideas and make them integrate in physical sphere ; its blog about youth willingness to concur change  by mutual effort and about using youth energy to create new sphere for Technology !!!!
1 Gravity Plane