Thursday, January 12, 2017

जो लड रहा है

जो लड रहा है लागातार
जो प्रयासरत है 
जो सर झुकाये है
जो कुछ मन मे ठाने है
जो खुद को जला रहा है
जो तपिस महसुस कर रहा है
जो हौसले से लड रहा है
विजय उसकी निश्चित है
रास्ते चाहे जो भी हो
जीत उसकी सुनिश्चित 

ऐसा है मेरा प्यारा भारत

कण कण मे राम विराजे
कण कण मे श्री कृष्णा
धरती परम पावनी यह
विश्व मे नही है इसका सानी
प्रहलाद और ध्रुव जैसे नगिने
रामदास और परमहंस
विवेकानंद जैसे श्रेष्ठ विद्वान
युगांतरो से सपुतो की धरा ये
ऐसा है मेरा प्यारा भारत!!

तु है कर्णधार खुदका

रात की है घडी
घनघोर है अंधेरा
स्याह मौसम ने डाला डेरा
उम्मीद है टुट रहा 
मन यूँही घबरा रहा
पथिक क्या तु ठहर जायेगा?
क्या बीच राह से लौट जायेगा?
तुने कष्ट आधा झेल है लिया
आँधियो से गुजर तु रहा
मन मे हजारो विचारो का हुजुम है उमडा
तु सोच ले समझ ले
हारे का कोई नही सहारा
अब तु देख ले
राह को टटोल ले
अपने दम को परख ले
जिन्दगी का भीषण इम्तिहान आगे
तेरे हर कार्यो का इनाम आगे
तु कदम बढायेगा तो तु ही जिम्मेदार होगा
अपने जय पराजय का साथ देगा
तुने सोच चलना कैसे शुरू किया
किस विचार का लंगर डाल दिया
उसको ही पतवार बना ले
उपर वाले पर भरोसा कर ले
वही खेवेंगे तेरी नईया
तु ही है जो कर्णधार खुदका
तुही स्वयं का मनोबल बढाता

प्रभु शक्ति दो

जिन्दगी का क्या है
ये तो बीत जायेगी
किसी दिन हमसे छिन जायेगी
प्रभु वह शक्ति दे दो
कर्म मार्ग पर आगे बढे हम
निष्क्रियता से सक्रियता को चले हम
धीरे ही सही किसी गंत्वय को पहुंचे हम

जिन्दगी यूँही बढती है

बवंडर की माफिक है जिन्दगी
क्या कब सामने आ जाए नी पता
किस दिशा मुड जाये नही पता
किस सोच मे हम पड जाये नही पता
बस विचारो के बादल उमडते घुमडते
कभी कभी वर्षा भी कर देते
जीवनचक्र चलता रहेगा
हम बवंडर मे नाचते रहेंगे
हमारा अंत भी और प्रारंभ भी होता रहेगा
कभी सुख कभी दुख कभी विचार शुन्यता
जिन्दगी के ये पहलु चलते रहेंगे
जिन्दगी यूँ ही बढती रहेगी!!

आज का युवा

हालातो के मारे किस्मत के सहारे जब एक युवा
कंपनी कंपनी भटकता है नौकरी के लिये
हर एक जगह से झुठे आश्वासन पाता है
वो उस समय विज्ञान के अध्याय नी याद कर पाता
जिन्दगी उसको नये पाठ सिखाती है
भुले बिसरे उस युवा को नौकरी मिल भी गई
तो जो उसने आज तक पढा है ना उसका कोई महत्व ना होता
वो कंपनी मे बैठ कर एक्सेल सीट भर रहा होता
या तो दुनिया भर की राजनिती सीख रहा होता
सेहत भी तो धोखा देती ही है
ये धोखा जब मिलता तो कुछ रटा रटाया याद नही आता
पढा लिखा आदमी भी बहुत बेबस और लाचार लगता
अरे यही लाचारी देखने को मेहनत करते हम
ये कैसी शिक्षा जो स्वास्थ्य से संबंधित बोध ना कराये
ये कैसी शिक्षा जो हमे हमारे अधिकार ना दिलाये
और सारा बंटाधार ये पैसे की भुखी जनता करती
ना आपको शुद्ध भोजन मिलता ना रहने को छत
जब आप घर छोड बाहर निकलते
तैयारी किसी एक्जाम की करने को कमर कसते
सब कुछ एक बहुत बडा दर्शन है
एक बडा सा कन्फ्युजन है
हमने तो कर ली पुरी पढाई अपनी
नई पौध को ये मेरा मैसेज है
हर हिस्सो को वरियता देना
इस वक्त कि जरूरत है!!

क्या पढा क्या सिखा

बचपन से जो पढा उसका विश्लेषण करूं
तो ये पाता हूं कुडा बना दिया जाता हमे
हर तरह के विचारो को गाँठ दिया जाता हमे
इतिहास से शुरू हो भुगोल तक नाचती जिन्दगी
गणित और विज्ञान मे चक्कर लगाती
हर कक्षा मे हो जाता अपग्रेडेसन
सवालो के स्तर का हो जाता प्रमोशन
जिन्दगी इन सवालो के बीच कब इक्किस बसंत देख लेती
अंदाजा भी नही होता
प्लेसमेंट मे प्रश्न भी हालाँकि यही से पुछे जाते
पर जिन्दगी के महायुद्ध का हथियार नही देते
साहस और निर्णय छमता का बोंध नही मिलता
त्याग और आत्मनिर्भर होने का पाठ कम दिखता