Sunday, February 26, 2012

सुबह

सुबह के ठंडी हवा के झोके!
कोयल के कूकने का आभास  हर पल!!
घुली हवाओ मैं एक खुशबू!
लेने  को बेताब अपने आगोश में!!
सूरज का तडके आयाम को छोड़ना!
हर जगह  एक प्यारा उल्लास होना !!
भर जाती तन मन  मैं ताजगी एकदम!
इस सुबह का निराला ही प्रभाव होता !!
सत्य  भी यही हैं अटल और अविचल !
रात के बाद सुबह होती और सुबह के बाद पुनः रात्रि!!
मानव जीवन से हैं रिश्ता इसका पुराना !
यहाँ भी सुख और दुःख एक दुसरे के पहलु हैं!!
वैसे ठीक एकदम जैसे सुबह जुडी रात्रि से !
प्रकृति जैसे सबकुछ समझा देती बरबस!!
यही तो इस गुरु का अनुपम प्रभाव हैं!
हम मनवो की बुद्धि ही थोड़ी  जड़ हैं!!
जो सरे संसाधनों के होते जाते कहीं और हैं!
जैसे तैसे फिर लौट के आते वही हैं!! 
मैं हूँ इसका एक प्रबल उदाहरन!
पर इस पल से हूँ प्रबल   !!
हैं क्या जो मानव नहीं कर सकता!
तेरे बल से तो गजराज का सिहांसन हिलता !!
बस एक बार जज्बा तो दिखा ऐ नौजवान !
मंजिल तो होगी ही तेरी ;ये कारवां भी होगा  तेरा ही !!
                                                                अभिषेक तिवारी  "अज्ञात"     
 
   
   

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