Wednesday, March 7, 2012

हम बढ चले है

हम तो आग पे हाथ रख के चल पड़ें हैं 
जलें   या जला दे ; क्या कर सकते  हैं
रास्तों  पे निशान  लगाके छोड़े ;कुछ बढ़ चलें हैं
हम तो आग ...................................
चाहें  भी तो बचना तो क्या मुमकिन हैं
ऐसा ही कुछ तमाशा  हम बन चलें हैं
गोयाकि  सुना हैं हर बार कुछ अच्छा
फिर भी आग पे चलने का सबा बन पड़ें हैं
होगी राहों पे रत और सवेरा भी ये सोच चलें हैं
हम .............................
खुद को पाना हैं हर हल मैं ये वादा कर चलें हैं
तनहइयो  के पार ही जन्नत  हैं ऐसा मान चले हैं
हम तो ...............         

Thursday, March 1, 2012

अंजान पथ का राही मै

अनजान पथ का राही मैं
हर पल निर्भीकता से परिपूर्ण
ये मैं नहीं मेरे अनगिनत प्रयास कहते
न ठहरा कभी न रुका  कभी
रहो का साथ निभाया मैंने ऐसे
समय के चाल  का एक मोहरा 
जो घडी -घडी नयी रह भटकता
कभी इस मोड़ पर तो कभी उस
यही मेरे पथ मार्ग का आइना
हर बार जब गलत राह भटकता हूँ
तो विस्वास यह खुद को दिलाता हूँ
की भट्काओ का  आलिंगन ही तो हैं ये जिन्दगी
आज दस हैं तो कल हजार होने का नाम हैं जिन्दगी
ये भाव की मूलता पर लौट आऊं हमेशा
दिल में बचाए रखना ही प्रयास हैं
क्योंकि इन भटकाओं में;मूल पे लौट आना प्रधान हैं
आज भले कंकड़ सा सदृस्य हूँ
पर कल के विचार सहेजने हैं
इन अनजान पथ पर भटकने का हेतु भी यही हैं
अभी लाखो और भटकाव के लिए हूँ तैयार
क्योंकि मंजिल तक पहुंचना ही धयेय हैं !!!!

    
 

कल की मत सोच

कल  क्या  होगा  किसको  पता ?
पावों में छालें होंगे या फूलों का कारवां !
आज भी हम युही चले जा रहे हैं
 जैसे चले कल  थे ;मंजिल को निगाहों में भरे
वक्त बेवक्त ये उलझे से रास्तें हमें रोक लेते
पर क्या कहें हम भी ;यूँही चले जा रहे
साँसों का दामन रहे सलामत मंजिल तक
थोड़ी हौसलों की डोर बंधी रहें ,बाकि हम देख लेंगे
कल का तो पता न होना ही अच्छा होता
इसी बहाने हम अपने राहों में आगे तो बढ़ते
और अजनबी इन राहों से कुछ थोडा और सिख लेते
कहते हैं दो  कदम आगे की देखो केवल 
इन दो कदमो को ही देख तू  मंजिल पहुँच जायेगा !!