मनुष्य हूँ मैं ; एक विराट खजाना
खोज पाऊं खुद को यही हैं सपना
हर पल व्याप्त चुनौतिया रास्तो पे पग पग
याद करा देती ये अस्तित्व के पर्याय को
खुद को बांध देती मजबूरियां यहाँ पे
समझता मन में की समझेगा विपछि
पर हर बार मिलता एक बड़ा सा दुत्कार मिलता यहाँ पे
जानता हूँ की हैं एक प्रचंड अग्नि भीतर
पर क्या खोज हैं मेरे अन्तेर की
स्वावलंबन और आत्मसम्मान दो ध्रुव मेरे
मेरे रस्ते यही से होकर हैं गुजरते
पर क्योँ दिग जाता हूँ पथ से खाके ठोकर
क्या सिखा नही जीना जीवन ; ठोकरे ही तो पर्याय हैं
ये मानता हूँ की हर गुण हैं सीखना मुमकिन
खाजन तो तो होता ही हैं एक से प्रकार
तो क्या बंधे हैं तुझे बढ़ने से मानुष
इस व्याप्त अनुनाद का तू भी तो हैं एक प्रकार
तू कर्मो से जुटता हुआ तो हैं पर फल की चिंता करता हैं
ये ही मिथ्या विचार पलता हैं ;याद कर गीता का सार
कर्मो को तू पुर्नाभाव से कर पर पाल न फलों की
सूर्य के ओज का कर ध्यान क्या उसने फल मांगे हैं
क्या चन्द्रमा ने फल की इच्छा की हैं ; तू कर्म कर
और स्वचंद्ता से आगे बढ़ ; क्योकि सोना ऐसे नही बनता
अभी तो दो कदम चला हूँ ; सैकड़ो मिल सफ़र बाकी हैं
सांसे तो चली अभी थोड़ी ; रौद्र रूप बाकि हैं
खुद पे हर चन भरोसा रख बन्दे
समय की कीमत समझ सदा तू
इस समय ने बड़े राजाओं को भी देखा हैं तो रंको भी
आज अगर तू इसमें आज अचाई का हवन देगा
तो नीचे ही कल कल पुण्य ही फूलेगा
खुद पे विस्वास हैं हर पल
और मनुष्य मैं मनुष्यता के खजाने को खोजे आगे बढ़ चल !!
खोज पाऊं खुद को यही हैं सपना
हर पल व्याप्त चुनौतिया रास्तो पे पग पग
याद करा देती ये अस्तित्व के पर्याय को
खुद को बांध देती मजबूरियां यहाँ पे
समझता मन में की समझेगा विपछि
पर हर बार मिलता एक बड़ा सा दुत्कार मिलता यहाँ पे
जानता हूँ की हैं एक प्रचंड अग्नि भीतर
पर क्या खोज हैं मेरे अन्तेर की
स्वावलंबन और आत्मसम्मान दो ध्रुव मेरे
मेरे रस्ते यही से होकर हैं गुजरते
पर क्योँ दिग जाता हूँ पथ से खाके ठोकर
क्या सिखा नही जीना जीवन ; ठोकरे ही तो पर्याय हैं
ये मानता हूँ की हर गुण हैं सीखना मुमकिन
खाजन तो तो होता ही हैं एक से प्रकार
तो क्या बंधे हैं तुझे बढ़ने से मानुष
इस व्याप्त अनुनाद का तू भी तो हैं एक प्रकार
तू कर्मो से जुटता हुआ तो हैं पर फल की चिंता करता हैं
ये ही मिथ्या विचार पलता हैं ;याद कर गीता का सार
कर्मो को तू पुर्नाभाव से कर पर पाल न फलों की
सूर्य के ओज का कर ध्यान क्या उसने फल मांगे हैं
क्या चन्द्रमा ने फल की इच्छा की हैं ; तू कर्म कर
और स्वचंद्ता से आगे बढ़ ; क्योकि सोना ऐसे नही बनता
अभी तो दो कदम चला हूँ ; सैकड़ो मिल सफ़र बाकी हैं
सांसे तो चली अभी थोड़ी ; रौद्र रूप बाकि हैं
खुद पे हर चन भरोसा रख बन्दे
समय की कीमत समझ सदा तू
इस समय ने बड़े राजाओं को भी देखा हैं तो रंको भी
आज अगर तू इसमें आज अचाई का हवन देगा
तो नीचे ही कल कल पुण्य ही फूलेगा
खुद पे विस्वास हैं हर पल
और मनुष्य मैं मनुष्यता के खजाने को खोजे आगे बढ़ चल !!
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