एक बार सोच लोग सफल कैसे होते हैं
एक ही उदेश्य को वो रोज हजार बार जीते हैं
मैं भी क्या पागल हूँ , एक कदम चला; सपना पलता हूँ
पर कहूं और क्या ;सफलता की गली भी तो यही
ये वो प्राणी होते जिन्हें हर पल आभास रहता
चेतन मैं चेतना बहती हर पल और खुद पे विस्वास होता
मैंने सोचा क्योँ न सोंचू पिताजी के बारे में
क्या उन्होंने नहीं देखा होगा सफलता का सपना
जो आज उनके कठिन परिश्रम के बाद फलता
रोज रात के रात वो गाड़ी पे क्यों दौड़ा करते
इसी प्रक्रिया मैं खाने पिने की सुध भुला देते
ये था सपने का छोटा सा प्रकार ; जो हैं एक गुढतम रहस्य
हम चलते रास्तो पे खोज सकते कुछ भी मुमकिन
तो क्या नहीं मुमकिन की खुद को करूँ एकाकार
हो विस्वास प्रगाढ़ खुद पे और और चेतना हो प्रस्फुटित
हर पल आखों मैं अग्नि ;ऊपर एक योजना पालें
जो इन अनगिनत मोड़ रूपी रास्तें को सीधा कर दे
योजना से याद आया की योजन यही से साधतें
कभी मैंने भी योजना बने होती थी अभी छोड़ दिया था
यही वो वजहें थे जिनसे मार्ग दुर्गम हुआ था
यहाँ हर समय योजना से बीतना चाहिए पल पल
योजना बनाओ खुद को हसमुख बनाने की
विचारो को एकाकार कर करों स्वप्न साकार
योजना बनाओं खुद को मजबूत बनाने की
योजना बनाऊं खुद को एकाग्र होने की
योजना बनाऊं लक्ष्य पाने की
समय प्रधान सारे योजन बन्दे झांक खुद मैं
और समय पाबंद बन तू ;हर पल हो सचेत
सामजिकता भी मेरा एक बड़ा प्रयोजन हैं
पर इसके मध्य कई योजन हैं
एक बार सोच लोग सफल कैसे........२
अभिषेक तिवारी "अज्ञात "
एक ही उदेश्य को वो रोज हजार बार जीते हैं
मैं भी क्या पागल हूँ , एक कदम चला; सपना पलता हूँ
पर कहूं और क्या ;सफलता की गली भी तो यही
ये वो प्राणी होते जिन्हें हर पल आभास रहता
चेतन मैं चेतना बहती हर पल और खुद पे विस्वास होता
मैंने सोचा क्योँ न सोंचू पिताजी के बारे में
क्या उन्होंने नहीं देखा होगा सफलता का सपना
जो आज उनके कठिन परिश्रम के बाद फलता
रोज रात के रात वो गाड़ी पे क्यों दौड़ा करते
इसी प्रक्रिया मैं खाने पिने की सुध भुला देते
ये था सपने का छोटा सा प्रकार ; जो हैं एक गुढतम रहस्य
हम चलते रास्तो पे खोज सकते कुछ भी मुमकिन
तो क्या नहीं मुमकिन की खुद को करूँ एकाकार
हो विस्वास प्रगाढ़ खुद पे और और चेतना हो प्रस्फुटित
हर पल आखों मैं अग्नि ;ऊपर एक योजना पालें
जो इन अनगिनत मोड़ रूपी रास्तें को सीधा कर दे
योजना से याद आया की योजन यही से साधतें
कभी मैंने भी योजना बने होती थी अभी छोड़ दिया था
यही वो वजहें थे जिनसे मार्ग दुर्गम हुआ था
यहाँ हर समय योजना से बीतना चाहिए पल पल
योजना बनाओ खुद को हसमुख बनाने की
विचारो को एकाकार कर करों स्वप्न साकार
योजना बनाओं खुद को मजबूत बनाने की
योजना बनाऊं खुद को एकाग्र होने की
योजना बनाऊं लक्ष्य पाने की
समय प्रधान सारे योजन बन्दे झांक खुद मैं
और समय पाबंद बन तू ;हर पल हो सचेत
सामजिकता भी मेरा एक बड़ा प्रयोजन हैं
पर इसके मध्य कई योजन हैं
एक बार सोच लोग सफल कैसे........२
अभिषेक तिवारी "अज्ञात "
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