मैं हूँ तुम हो और ये जिन्दगी
क्या खूबसूरत खेल जो हैं ये खेलती
पल दर पल एक नए अनुभव विचारो से ये कराती
जो न रुकतीं कभी न थकते कभी प्रस्फुटित अविचल
जिनकी उर्जा ना होती खत्म कभी रहें हर दम चंचल
क्या बात हैं मानव रचना की विचारो से आलिंगन की
इस अभियांत्रिकी को तुम क्या कहोगे जो हैं गुध्तुम प्रधान
कोई तो युक्ति होगी जो इस रचना से करेगी रूबरू
और कहेगी हमसे ये मार्ग चुनो जो लछ्य तक जाता हैं
जो बताता ये मार्ग हैं चलने का ; और चल चलें हम
मेरा मार्ग तो सफ़ेद रंग सा हैं होता प्रतीत मुझको
चल चलें हैं निरंतरता से पर दीखते नही पग
क्या होती ऐसी ही जिन्दगी ; दूरदर्शन का क्या इंतजाम
कुछ बदलाव तो नितांत प्रधान इस पल से
जो शायद दे मेरा मार्ग हरा सा ; प्रयास सुरछित
कल प्रधानतम दृश्य प्रदर्शित होगा आखों को
इस लिए चलते रहना नितांत हैं यहाँ आवश्यक !!
क्या खूबसूरत खेल जो हैं ये खेलती
पल दर पल एक नए अनुभव विचारो से ये कराती
जो न रुकतीं कभी न थकते कभी प्रस्फुटित अविचल
जिनकी उर्जा ना होती खत्म कभी रहें हर दम चंचल
क्या बात हैं मानव रचना की विचारो से आलिंगन की
इस अभियांत्रिकी को तुम क्या कहोगे जो हैं गुध्तुम प्रधान
कोई तो युक्ति होगी जो इस रचना से करेगी रूबरू
और कहेगी हमसे ये मार्ग चुनो जो लछ्य तक जाता हैं
जो बताता ये मार्ग हैं चलने का ; और चल चलें हम
मेरा मार्ग तो सफ़ेद रंग सा हैं होता प्रतीत मुझको
चल चलें हैं निरंतरता से पर दीखते नही पग
क्या होती ऐसी ही जिन्दगी ; दूरदर्शन का क्या इंतजाम
कुछ बदलाव तो नितांत प्रधान इस पल से
जो शायद दे मेरा मार्ग हरा सा ; प्रयास सुरछित
कल प्रधानतम दृश्य प्रदर्शित होगा आखों को
इस लिए चलते रहना नितांत हैं यहाँ आवश्यक !!
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