क्या खुब रंग
बदलती प्रकृति
जीवन मे भी परिवर्तन करती
ग्रीष्म ऋतु से ठंण्ड तक
बसंत से पतझड तक
हर ऋतु की अपनी पहचान
क्या खुब हमे उलाझाये रखती
मन के विचारो को भी बदल देती
कभी प्रकाश तो कभी अंधकार करती
जीवन के निरस पन्नो मे रस भरती
अपने कई रूप रंगो से रंगती
सच मे माँ का आचँल जैसी है तु
हर एक बच्चे पर जान छिडकती
सबको अपने पहलु मे समेट लेती!!
जीवन मे भी परिवर्तन करती
ग्रीष्म ऋतु से ठंण्ड तक
बसंत से पतझड तक
हर ऋतु की अपनी पहचान
क्या खुब हमे उलाझाये रखती
मन के विचारो को भी बदल देती
कभी प्रकाश तो कभी अंधकार करती
जीवन के निरस पन्नो मे रस भरती
अपने कई रूप रंगो से रंगती
सच मे माँ का आचँल जैसी है तु
हर एक बच्चे पर जान छिडकती
सबको अपने पहलु मे समेट लेती!!
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