
क्या हैं सिमटी सी मौलिकता मेरी !
हर एक पत्थर के चोट पर , असहाय सी !!
प्रतिस्वर ,और अनुभूति , से विमुख!
किस गल्प मैं खोया हैं; ये पूछता अंतर्मन !!
क्या करू किसके पास जाऊ , कोई नही क्या इस जग मैं मेरा ?? पापो के पिटरो से बड़ा पिटारा रखा हैं , ये !
वेदना की अनुपम सीमओं से आलिंगन करता बारंबार !! अपने आप से सवालो को तलाशता एक भिखारी !
जिसने सिख लिया हैं जमानो के टुकडो पर पलना !!
होगा तो कोई दरवाजा जो खोलेगा रह मेरी !
देगा छुटकारा इस अंधी दौड़ से!!
अभिषेक तिवारी
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