
जिन्दगी को समझना चाहा बहुत मैंने !
नाकाबिल रहा अब तक फासले पाटने में !!
दस्तक तो लगातार मिलती गयी मुझको !
शिकवा रहा यही की , लगा रहा अपने मैं !!
तो क्या गलतिया हुई हैं हमसे कहीं ??
खुदगर्ज शरीफ़ हूँ मैं , इसका जरा सा भी नहीं इल्तजा !!
ठीक हैं - समझ रहा हूँ , अपनी बेबसी को !
पर करूँ क्या!! और ये क्या हैं ये माजरा ??
उम्मीद का दामन तो नहीं टुटा हैं , अभी तक!
बस फर्क इतना हैं की लौ धीमी हो गयी हैं !!
खुद को हमेशा उडेधता रहा मैंने क्या ?
जिन्दगी इसलिए इतनी उदासीन हो गयी हैं !!
ऐ मालिक के नेक बन्दे , ऐसे न उदास हो !
फिर से अपनी लौ की तलाश कर !!
झाक के देख किसी कोने में ; एक चिंगारी खोज में तेरे !
सुखी जा रही हैं ..................................................!!
उम्मीद के दामन का हमेशा साथ दे , गोया की !
जिन्दगी बड़ी लम्बी हैं पर किस तरह काटे !!
हैं ; ये तुझपे निर्भर , उठ एक बार फिर से !
वंदना कर , नमन कर के एक हुंकार भर !!
सांसो में एक फुंकार भर ; हो जायेगा !
सब संभव कही से कुछ भी नहीं रहेगा !
असंभव , मालिक की भी यही रजा हैं !!
की खुद को तू न कम समझ ;कोशिशे !
हमेशा होती हैं सफल , कर इसे बुलंद !!
और ले ले अपना मलंद !!!!!
अभिषेक तिवारी
No comments:
Post a Comment