शब्दो की कमी पड
जाती
जीवन की अनिश्चितता को उद्धृत करने मे
बचपन जवानी अधेडपना और बुढापा
ये चार दौर जीवन के चार छोर
किसी से किसी का नी तालमेल
हर किसी की अपनी अलग प्रकृति
मन की स्थिती भी तो रंग बदलती
किस उम्र की क्या जिम्मेदारी क्या कहूं मै
बचपन जैसे सुनहरी धुप
जवानी सुरज चढा आकाश
अधेडता मे ढलता सुरज
बुढापा मे जैसे हो गया अस्त अब
मन मे चल रहे विचारो की भी शायद यही कहानी
उच्चता से निम्नता को बढे जैसे
प्रभु आप ही सम्हालो इस जीवन की डोर को
आप ही बचा लो इस भवँर जाल से!
जीवन की अनिश्चितता को उद्धृत करने मे
बचपन जवानी अधेडपना और बुढापा
ये चार दौर जीवन के चार छोर
किसी से किसी का नी तालमेल
हर किसी की अपनी अलग प्रकृति
मन की स्थिती भी तो रंग बदलती
किस उम्र की क्या जिम्मेदारी क्या कहूं मै
बचपन जैसे सुनहरी धुप
जवानी सुरज चढा आकाश
अधेडता मे ढलता सुरज
बुढापा मे जैसे हो गया अस्त अब
मन मे चल रहे विचारो की भी शायद यही कहानी
उच्चता से निम्नता को बढे जैसे
प्रभु आप ही सम्हालो इस जीवन की डोर को
आप ही बचा लो इस भवँर जाल से!
No comments:
Post a Comment