Thursday, January 12, 2017

प्रभु बचा लो भवर जाल से

शब्दो की कमी पड जाती
जीवन की अनिश्चितता को उद्धृत करने मे
बचपन जवानी अधेडपना और बुढापा
ये चार दौर जीवन के चार छोर
किसी से किसी का नी तालमेल
हर किसी की अपनी अलग प्रकृति
मन की स्थिती भी तो रंग बदलती
किस उम्र की क्या जिम्मेदारी क्या कहूं मै
बचपन जैसे सुनहरी धुप
जवानी सुरज चढा आकाश
अधेडता मे ढलता सुरज
बुढापा मे जैसे हो गया अस्त अब
मन मे चल रहे विचारो की भी शायद यही कहानी
उच्चता से निम्नता को बढे जैसे
प्रभु आप ही सम्हालो इस जीवन की डोर को
आप ही बचा लो इस भवँर जाल से!

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