चल की मंजिल
पुकार रही
राहो की परेशानियों से लडकर
अपने मन के उथल पुथल झेलकर
तु आगे बढ चल
रूकने का नही कोई औचित्य
प्रभु को मन मे बसाये बढचल
मंजिल पर पहुंच कर थमना
ऐसे रूक जाने का नही कोई प्रयोजन
चाहे राहे फैली हो सैकड़ों योजन!
राहो की परेशानियों से लडकर
अपने मन के उथल पुथल झेलकर
तु आगे बढ चल
रूकने का नही कोई औचित्य
प्रभु को मन मे बसाये बढचल
मंजिल पर पहुंच कर थमना
ऐसे रूक जाने का नही कोई प्रयोजन
चाहे राहे फैली हो सैकड़ों योजन!
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