Thursday, January 12, 2017

तुम जब आना
कठोर होके आना
कइ जख्म दिखेंगे
इस अन्तर्मन मे
समय की मार से
मेरी आखे पथराइ होंगी
वक्त के छोर ढुढते हुए
कइ सपनो मे उलझा
शायद अनमना दिखुंगा
धरोहर ऐसी मिलेगी तुम्हे
तुम जब आना
कठोर होके आना
बडी जज्बातो से खोजता
रहा हूं तुम्हारे वजुद को
जो एक अनसुलझी सी
पहेली सी लगी मुझको
चेहरो के अक्स छाने
कोइ नही है ठिकाना
मै कठोर हो चुका हूं
भाव मन के सुखे
तुम जब आना

कठोर होके आना

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