Sunday, January 8, 2017

वो बुढा

वो बुढा बैठा हुआ है
पेडो पर से गिरते पत्ते निहार रहा है
हवा मद्धम सी चल रही है
हल्की हल्की धुप चढी है
जाने जीवन के कितने दिन बीत चुके है
ना जाने कितनी राते काट चुका है
मन की इच्छाये अब बुझ चुकी है
फिर भी ना जाने किस बात की चिन्ता हो रही है
वो सिर गडाये हुये है
इस दुनिया को छोडने का वक्त नजदिक है
क्या किया क्या दिया क्या लिया
शायद यही सोच रहा है
जीवन बीत चुका है
सुरज ढल चुका है
प्रकृति अपने छाव पे है
यही जीवन की राह है!!

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